शिकार करना

भुइयार(जिसे पंडो नाम से जाना जाता है)गोंड और चेरवास परंपरागत शिकारी थे। वे धनुष और तीर का इस्तेमाल करते थे। कुछ तीर में जहर हुआ करते थे। जहर को तीर के निचले हिस्से में लगाया जाता था।अच्छे निशानेबाज़ चयनित स्थानों पर बैठते थ।दूसरो लोग जानवरों को हाक कर भगाते थे और जब जानवर बीस गज की दूरी के भीतर आते थे तब निशानेबाज़ उनपर तीर छोड़ते थे।धनुष के दो सिरों को जोड़ने के लिए एक पतली पट्टी बांस से बनाया जाता था। यह दूसरी और तीसरी उंगली द्वारा खींचा जाता था,एकलव्य (महाभारत के एक पात्र) अपने अंगूठे को खो दिया था जिसे गुरु द्रोणाचार्य ने गुरु दक्षिणा के रूप में अंगूठे की मांग की थी,इसलिए कभी उसके बाद से आदिवासी समुदाय ने अंगूठे की मदद से धनुष नहीं खीचते है। खरगोश का शिकार छोटे क्षेत्रों में किया जाता था। क्षेत्र के तीन पक्षों को पेड़ों की छोटी शाखाओं द्वारा बांधा जाता था। खरगोश को खुला पक्ष के माध्यम से अन्दर की ओर भेज कर उसके मरने तक मारा जाता था। शिकार का एक विशेष तरीका संगीत ध्वनियों के उपयोग के द्वारा भी अभ्यास किया जाता था। झुमका का उपयोग संगीतमय ध्वनि बनाने के लिए किया जाता था।यह एक लोहे की छड होती है जिसपर बहुत सारे छले के साथ घुंगरू और अंगूठ लगे होते है।

रात में लोगों के एक समूह पार्टी का गठन करके जंगल की ओर जाया करते थे जहां उन्हें हिरण और खरगोश मिल सकते थे। मशाल की जगह में, वे एक छोटा सा घड़ा रखते थे जिसके केंद्र में तीन इंच का परिपत्र छेद हुआ करता था। घड़े में जलती बांस की लाठी रखी जाती थी,लौ एक प्रकाश फैलता था जो घड़े के छेद के माध्यम से पेश होता था। यह एक मशाल की तरह काम करता था। एक व्यक्ति झुमका बजता था, संगीत खरगोश और हिरण को आकर्षित थे। वे पास आते थे औरे संगीत से सम्मोहित हो जाया करते थे। जब ये पहुँच में आ जाते थे तब पार्टी से एक या दो व्यक्ति सामने आके उनको छड़ी से मारते थे। यह कहा जाता है कुछ समय चीता और बाघ भी संगीत से आकर्षित हो जाते थे। ऐसे समय झुमका संगीत को धीरे करके जंगल से बाहर चले जाते थे।

जंगली तीतर एक शिक्षित तीतर की मदद से पकड़े जाते थे। शिक्षित तीतर को पेड़ के पास एक पिंजरे में रखा जाता था। एक जाल से पिंजरे को घेरा जाता है। शिक्षित तीतर के मालिक पेड़ के शीर्ष पर बैठे थे। तीतर को बसेरा करने के लिए प्रशिक्षित किया जाता था जब मालिक सीटी बजाना शुरू करते थे। जैसे ही तीतर बसेरा शुरु करता था जंगली तीतर पास के झाड़ियो से जहाँ बसेरा की ध्वनि आ रही होती थी उस ओर आ जात थे। तब वे जाल में फस जाते थे,कुछ समय आठ से नौ तीतर एक समय में पकडे जाते थे। शिक्षित तीतर कुतनी नाम से भी जाना जाता था।

कुछ समुदायों बांस की लाठी से बनी चमक के साथ रात में नदियों के पास जाते थे। चमक के प्रकाश से मछली आकर्षित होके सतह तक आ जाते थे और उसके बाद ग्रामीणों मछली मारने के लिए एक तीन आयामी भाला इस्तेमाल करते थे। उथले धाराओं में धनुष और तीर का इस्तेमाल किया जाता था जब मछली सतह पर आ जाते थे।

पेड़ पर बैठे पक्षी लासा के द्वारा पकड़े जाते थे। चिपचिपा दूधिया रस महुआ, बार और पीपल का मिला कर एक छोटे से बांस कंटेनर में रखा जाता था। 18 इंच लम्बी और बहुत पतली बांस की छड़ी को दूधिया तरल में डूबा कर पेड़ की शाखाओं पर रखा जाता था जहाँ पक्षी बैठते थे जब पक्षी शाखाओं पर बैठते थे चिपचिपा दुधिया तरल पक्षी के पंखो में स्थानांतरित हो जाता था छड़ी पक्षी के पंखो से चिपक जाते थे। वे उड़ान भरने में असमर्थ होके गिर जाते थे। हरा कबूतर, जंगली पीन कबूतर, जंगली कबूतर, कबूतर, मैना, तोता आदि सब इस तरह से नीचे गिराए जाते थे।

पंछियों को मरने के लिए तीर और धनुष तकनीक से रात को अभ्यास किया जाता था। ग्रामीणों पक्षियों को देख कर जब वे रात में पेड़ों में बसेरा के लिए आते थे। रात में, वे पेड़ के नीचे सूखे बांस की लाठी का एक बंडल जला देते थे। आग की रोशनी उन्हें पक्षी का पता लगाने के लिए पर्याप्त रौशनी दे देती थी। धनुष और तीर के साथ गोली मार दी जाती थी। तीर में एक भी धातु का टुकड़ा नहीं रहता था। इसके अंत में एक छोटे लकड़ी का टुकड़ा रहता था। पक्षी को इस तरह के तीर से मारा जाता था। तीर के अंत में लकड़ी के टुकड़े को ठेपा के रूप में जाना जाता है।

जंगली सुअरों को खरीफ के मौसम के दौरान मार दिए जाता था जब वे गांव के लिए आते थे। तीन फुट चौड़ा और छह फुट लम्बी गहरी खाइयों को खोदा जाता था और ग्रामीण सूअरों के झुण्ड को खाई के दिशा कर गिरा दिया जाता था और भाले से मार दिया जाता था। सांभर हिरन गांव वालों के लिए एक आसान शिकार था। वे कुत्तों की मदद से इसका पीछा किया करते थे।

जहर को तीर पर इस्तेमाल किया जाता था उस समय शिकारी को जानवर का मांस खाने में सावधान रहना रहता था। तीर के आसपास के मांस को दूर फेंक दिया जाता था। कुछ मामलों में वहाँ हताहत हो जाते थे जब वे जहर वाले तीर द्वारा मारे गए जानवरों का मांस ले लिया करते थे।